January 5, 2026

कहानी – शापमुक्त | Story – Shaapmukt

By Alka Sinha

कहानी – शापमुक्त | Story – Shaapmukt
“बंद करो यह म्यूजिक,” वान्या वैष्णवी झल्ला पड़ी।
पल भर में वातावरण शांत हो गया। यह घर उसकी मर्जी से चलता है। कुछ देर पहले उसने ही म्यूजिक चलवाया था, पर अब यह उसका ध्यान भटका रहा था।
“तुम्हारा बस चले तो तुम सबको खामोश कर दो। बुत में बदल दो। एक तान्या काफी नहीं।” कोई आवाज कानों में फुसफुसा गई थी।
“मैंने उसे बुत बना दिया है?” वह पूछना चाहती थी मगर जबान ने साथ न दिया। उसकी आवाज किसी गहरे कुएं में धंस कर रह गई। क्या तान्या के साथ भी ऐसा ही होता होगा? क्या वह भी बहुत कुछ कहना चाहती होगी मगर उसकी आवाज किसी खाई, किसी गुफा में दफ्न हो जाती होगी!
वह खुद को बेहद असंयत, असंतुलित महसूस करने लगती है। तान्या उसके जीवन का ‘डार्क-स्पॉट’ हो कर रह गई है। क्या उसकी इस स्थिति के लिए वह जिम्मेदार है? कोई उससे बार-बार प्रश्न करता है। वह खुद को कोई माकूल जवाब नहीं दे पाती है।
घुंघराले बाल और गहरी काली आंखों वाली तान्या कितनी खूबसूरत दिखती थी। हर कोई उससे बात करना चाहता था मगर उसने खुद को अपने ही भीतर ऐसा कैद कर लिया कि वह बेतरतीब पड़ी किसी वस्तु की तरह हो गई, जिस तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता। तान्या सदा से ऐसी नहीं थी। मगर उम्र के साथ बढ़ती हुए तान्या अपने भीतर गुम होती चली गई। लाख कोशिशों के बावजूद वह मुश्किल से कुछ बोलती। अन्य बच्चों-सी चपलता नहीं थी उसके भीतर। वह अक्सर किसी दीवार पर टकटकी लगाए रहती या फिर, आंख बंद कर कुछ देखती रहती। आंखें बंद कर देखने का उपक्रम कितना कठिन होता होगा मगर उसके लिए यह बहुत सामान्य था। कई बार लगता जैसे खुली आंखों से भी वह उस दुनिया को नहीं देखती जिसे बाकी लोग देखते थे। उसके भीतर का उल्लास शिथिल हो गया था।
वैसे, ऐसा भी क्या हुआ था उसके साथ? कई बार वान्या वैष्णवी खुद को टटोलती। तब उसे खुद को अवसाद से बाहर निकालने में अकथ मेहनत करनी पड़ती। शहर की नामी मोटिवेशनल स्पीकर वान्या वैष्णवी के शब्द सारी दुनिया के लिए अलग ही अहमियत रखते थे। लोग उसके कहे अनुसार खुद में सकारात्मक बदलाव लाने की कोशिश करते और वान्या वैष्णवी के व्याख्यानों का जादू सबके सिर चढ़कर बोलता। मगर यह जादू तान्या पर रत्ती भर भी असर नहीं करता। किसी बुत की तरह वह हर बात सुन लेती, अपेक्षित ढंग से कर भी देती मगर बोलती कुछ नहीं।
वान्या वैष्णवी का बड़े-बड़े मंचों पर जाना होता था, भाषण देते हुए उसकी जुबान न थकती थी, मगर क्या था जो अपनी ही बेटी के मामले में उसके शब्द उसका साथ न देते। उसकी आवाज में वह जोश, वह सचाई आने ही न पाती जो दुनिया बदलने की ताकत रखती है। तान्या को लेकर वह बहुत असहाय थी। असहाय क्या, वह हार चुकी थी। उसने बहुत-सी कहानियां सुनाकर उसे मुखर करने की कोशिश करके देख ली। ऊर्जा से भरे उसके शब्द कुछ काम न करते, जोशीले गीतों का उस पर कुछ भी असर न होता। एक बार वह उसे, केवल उसे अपने साथ सिनेमा दिखाने ले गई। रास्ते भर वह उससे कुछ-कुछ बतियाती रही, उसे हंसाने की कोशिश में खुद बेतहाशा हंसती रही पर तान्या पर रत्ती भर भी फर्क न पड़ा। वह निर्जीव आंखों से उसे देखती रही। एकबार तो लगा कि वह उसे जोर से झकझोर दे। कई बार ‘शॉक थेरेपी’ भी बहुत कारगर होती है। हताशा और गुस्से में भर कर दांत पीसते हुए उसने अपना हाथ तान्या की तरफ उठाया भी, मगर तान्या का बेजान चेहरा देखकर वह खुद ही शॉक में आ गई।
“आखिर ऐसा भी क्या हो गया है कि तुम कुछ बोलती ही नहीं? बहुतों के साथ बहुत कुछ गुजरता है पर वे जिंदगी से मुंह नहीं फेरते। वे फिर उठते हैं, यत्न करते हैं और दुनिया बदल कर रख देते हैं…” कहते-कहते उसके होठों के किनारों पर थूक जम आया। हताशा में उसकी आंखें जलने लगीं और वह खुद अवसादग्रस्त महसूस करने लगी। आखिर वे सिनेमा देखे बिना ही वापस आ गए। तान्या को किसी बात से कोई अंतर नहीं पड़ता था। न सिनेमा जाने से खुशी हुई, न लौट आने से नाराजगी। दरअसल, उसके लिए यह सब कुछ मायने ही नहीं रखता था। तब क्या मायने रखता था? कुछ नहीं, वस्तुतः कुछ भी नहीं। मगर उसका यह मौन, उसका यह एकाकीपन वान्या वैष्णवी के लिए बहुत मायने रखता था। तान्या की चुप्पी उसके लिए चुनौती थी और वह बार-बार कमर कस कर उस चुनौती का सामना करने को आ खड़ी होती और हर बार मुंह की खाकर लौटती। तब वह खुद को बड़ा कोसती।
दरअसल, कई बार उसे भी लगता कि तान्या की इस स्थिति के लिए वह स्वयं जिम्मेदार है। पर वह कर भी क्या सकती थी। उसे उस समय जो विवेकशील लगा, उस निर्णय का चुनाव उसने किया और यह मान लिया कि वह कभी गलत नहीं हो सकती। पर सवाल यह भी था कि यदि तान्या के बदले वहां…