डायरी – तिहाड़ जेल में एक दिन | Diary – A Day in Tihar Jail
डायरी – तिहाड़ जेल में एक दिन | Diary – A Day in Tihar Jail
11 अप्रैल, 2017
तिहाड़ जेल के गेट पर हो रही सख्त जांच से लोग परेशान हो रहे थे। सामान तो छोड़िये, पैसा-पर्स तक ले जाना मना था। आई कार्ड से व्यक्ति की पहचान की जा रही थी और लिस्ट से नाम मिलाकर ही प्रवेश दिया जा रहा था। मैं पहले भी इस तरह की जांच से गुजर चुकी थी, इसलिए मुझे इसकी सख्ती का अंदाजा था मगर जो पहली बार आ रहे थे वे काफी हैरान-परेशान थे। खैर, औपचारिकताएं पूरी कर हम भीतर वाले अहाते की तरफ आ गए। लोहे के बड़े गेट के भीतर एक छोटा गेट था जिसे हमारे लिए खोल दिया गया। यह गेट मेरे लिए काफी ऊंचा था, मुझे पैर भीतर करने में परेशानी हुई। भीतर आने पर दोबारा जांच का वही सिलसिला… आपके पास मोबाइल तो नहीं? पैसे? लोहे की कोई वस्तु या कोई मेटल? ये सब चीजें मुख्य द्वार पर पहले ही धरा ली गई थीं, इसलिए किसी के पास कुछ नहीं मिला। पुरुषों की कलाई पर भारत सरकार की मुहर लगा दी गई ताकि कैदियों और उनमें फर्क किया जा सके। बात अटपटी थी, कुछ हद तक आपत्तिजनक भी, मगर कुछ किया नहीं जा सकता था। अब महिलाओं की बारी थी। भीतर के कमरे में ले जाकर हमारी तलाशी ली गई। सब प्रकार से आश्वस्त होने के बाद हमें जेल नंबर 4 की तरफ ले जाया गया। जेल होने के बावजूद यह बहुत आकर्षक ढंग से बनाया गया था। हरे-भरे पेड़ों के बीच से हम भीतर वाली सड़क पर मुड़ गए। अरे वाह! ठीक सामने लगभग 15 फीट ऊंची दीवार पर क्या खूबसूरत पेंटिंग बनाई हुई है! मैं इन दिनों घर में सफेदी-पेंटिंग का काम करा रही हूं, इसलिए अंदाजा लगा सकती हूं कि इस तरह की वॉल पेंटिंग और टेक्स्चर इत्यादि कितनी महंगी होती है। जेल की खूबसूरती पर इतना पैसा लगाना सच में हैरत की बात है। फिल्मों में जेल की जैसी दुर्दशा दिखाई जाती है, वास्तविकता में ऐसा नहीं है। तिहाड़ जेल की कारागार महानिरीक्षक रहीं किरण बेदी की पहल से बहुत कुछ बदला है और कैदियों को बेहतर जीवन देने के सार्थक प्रयास किए गए हैं।
उनकी चाल कुछ तेज ही थी और हमें साथ-साथ चलना था। दरअसल वहां की व्यवस्था के मुताबिक वे हम सभी को एकसाथ ही लेकर चलना चाहते थे और एक-दूसरे का इंतजार करते हुए हमें कुछ देर हो चली थी। हमारी दाहिनी तरफ कुछ बैरक्स बने थे जिन्हें मदर टेरेसा, अब्दुल कलाम जैसे महापुरुषों के नाम दे रखे थे। जबकि बाईं ओर खड़े ऊंचे घने पेड़ हंस-हंस कर दोहरे हुए जा रहे थे कि हम कविता पढ़ने जेल के भीतर जा रहे हैं। जी, हां ! हमारा जुर्म कविता लिखने का था और हमें यहां कविता-पाठ के लिए आमंत्रित किया गया था। इससे पहले भी दो बार मैं यहां आ चुकी थी और यह पाया था कि कैदियों के भीतर भी कविताओं के प्रति अद्भुत रुझान होता है।
पेड़ों के झुरमुट को निहारते हुए हम भीतर वाले मैदान में आ पहुंचे जहां ऊंचे चबूतरे पर कवि-मंच बनाया गया था। लगभग ढाई-तीन सौ कैदी पहले से ही वहां बैठे हमारा इंतजार कर रहे थे। हमें आते देख वे जोर-जोर से तालियां बजाकर अपना उत्साह व्यक्त करने लगे। पहली बार जब यहां आई थी तो मैं भी इनके उत्साह में जा मिली थी। आज भी याद है, कविता पाठ के बाद 18-20 वर्ष की उम्र के कुछ लड़के हमसे मिलने चले आए और मैं भी आदतन इनसे आत्मीयता में भर कर बात करने लगी थी। हर रचनाकार के लिए श्रोताओं की प्रतिक्रिया बहुत मायने रखती है। उस वक्त तत्कालीन जेल अधीक्षक शमशेर सिंह जी ने इन कैदियों को हुड़का कर भगा दिया और हमें आगाह किया था कि हमें इनसे थोड़ा फासला ही रखना चाहिये। उनकी वह नसीहत मेरे उत्साह पर लगाम कस गई जो आज तक कसी है। हालांकि, ये सभी बहुत व्यवस्थित से बैठे हुए थे और हमारे नाम पुकारे जाने पर उत्साह से स्वागत कर रहे थे, फिर भी, मन ने एक हाथ की दूरी बना रखी थी। ‘परिधि आर्ट ग्रुप’ के सौजन्य से आयोजित इस ‘अंतर्मन परिधि काव्य संध्या’ का संचालन मुझे ही करना था। थोड़ी धुकधुकी थी, मन पूरी तरह खुल नहीं पा रहा था। समझ नहीं पा रही थी कि बात कहां से शुरू करूं। डर था कि भावना में बह कर मैं कहीं इनकी कोई दुखती रग न छेड़ दूं। मैंने उनकी जल्दी रिहाई की कामना के साथ कार्यक्रम प्रारंभ किया। कमाल है! इस कामना ने उन्हें बच्चों-सा उल्लसित कर दिया। वे तालियां बजाकर अपनी खुशी जाहिर करने लगे। उनके आह्लाद ने यह सोचने को मजबूर कर दिया कि इनके लिए कितना कौतुक भरा है ऊंची दीवारों के उस पार का जीवन… छूटे हुए घर-परिवार से मिलने की लालसा… और अपनी मर्जी का जीवन जीने की आजादी! पर ये आजादी भी कितनों को नसीब होती है? हैं तो हम सब भी कैदी ही। समय की सीमा में कैद, समाजिकता और व्यावहारिकता के गणित में कैद… रिहाई का ख्याल ही मन को कैसा तरोताजा कर देता है। झूमते हुए पेड़ों को देखो, कैसे बेमतलब ही मस्त हुए जा रहे हैं। शायद कह रहे हैं कि जेल की चारदीवारी के भीतर भी उनकी आजादी पर कोई पहरा नहीं लगा सकता।
कवि सम्मेलन शुरू करने से पहले मैंने जेल अधीक्षक राजेश चौहान साहब को आमंत्रित किया। उनके उद्बोधन पर कैदियों का उत्साह देखने लायक था। उनकी हर बात पर तालियां बज रही थीं।
“इनको सभी कैदी बहुत प्यार करते हैं,” ‘परिधि आर्ट ग्रुप’ के अध्यक्ष निर्मल रतनलाल वैद ने चौहान साहब की तरफ इशारा करते हुए मुझे धीरे से बताया।
“जाहिर है,” मैंने उल्लसित कैदियों की ओर देखा।
मेरे भीतर की बंदिशें भी अब टूटने लगी थीं और मैं सहज भाव से कवियों को बुलाने लगी थी। कवियों ने इस बात का खास ध्यान रखा कि हम कोई ऐसी कविता न सुनाएं जो इन्हें भावुक कर दे। सभी प्रेरक अथवा हास्य-व्यंग्य वाली रचनाएं सुना रहे थे। और ये कैदी तो जैसे हंसने को तैयार बैठे थे। जरा सी चुटकी लेते ही ठहाका लगा पड़ते। सामने की पंक्ति में काली टी-शर्ट में बैठा लड़का उनका लीडर मालूम पड़ता था। उसकी पहल पर उसके साथी जोर से तालियां बजाने लगते या फिर खिल-खिल कर हंसने लगते। अपनी खुशी जाहिर करने के लिए शायद इन्हें तालियां बजाने का खासा अभ्यास कराया गया था। हर बात पर सभा में तालियां गड़गड़ा जातीं।
उत्सव का माहौल था। सभी श्रोता कविताओं का आनंद उठा रहे थे कि 18-19 साल का एक लड़का पिछली तरफ से सीढ़ियां चढ़कर मंच पर चला आया।
“मैं भी अपनी कविता पढ़ना चाहता हूं,” उसने अपनी मुट्ठी में दबाए कागज की ओर देख कर अनुरोध किया।
“ये आपने लिखी है?”
मेरे पूछने पर उसने हामी भरी।
“आप यहां क्या करते हैं?” श्रोताओं को उसका परिचय देने की गरज से मैंने जानना चाहा।
“जी, मैं ट्रायल पर हूं।” उसके अधूरे जवाब से मैं कुछ समझ नहीं पाई।
“मुझ पर दफा 307 का केस चल रहा है। फिलहाल जुर्म साबित नहीं हुआ है।” उसने समझाकर कहा तो मैं जैसे नींद से जागी। बदन में सिहरन-सी महसूस हुई। याद आया, हम तिहाड़ जेल में सजायआफ्ताओं के बीच कविता पाठ कर रहे हैं। किसी ने जैसे अचानक ही बहती नदी का प्रवाह रोक दिया। मन की लगाम खींच ली।
“गांव में कुछ झगड़ा-वगड़ा हो गया था, मैडम जी।” मेरे अवाक् चेहरे को देख कर उसने मुझे संयत किया।
मैं संयत तो हुई पर कुछ चौकस भी हो गई कि अपनी मर्जी से इसे कविता पढ़ने को बुलाऊं या नहीं। सुपरिंटेंडेंट साहब मंच पर ही बैठे थे, मैंने उनकी ओर सवालिया निगाहों से देखा। उनकी सहृदयता से उसे कविता पढ़ने का मौका दिया गया।
वह एक समझदार लड़का था। वह कविता की अकादमिक शर्तें पूरी करता हो या नहीं, पर उसकी कविता में ईमानदारी थी। अपनी कविता के जरिये उसने अपनी मां को आश्वस्त किया था कि नशा न करने की उनकी सीख को वह भूला नहीं है। उसने यह भी भरोसा दिलाया कि जल्दी ही बेकसूर साबित होकर वह घर लौट आएगा। उसकी कविता मेरे भीतर अजीब-सी बेचैनी पैदा कर रही थी। मैं उसकी ईमानदारी पर यकीन करना चाहती थी और उसकी रिहाई के लिए सच्चे दिल से दुआ करने लगी थी। उसकी कविता पर खूब तालियां बजीं। उसकी कविता के भाव वहां बैठे न जाने कितने ही लड़कों के अंतर्मन को छू रहे थे और उन्हीं के बीच से होने के कारण भी उसे बहुत प्यार मिला।
कार्यक्रम खत्म होने को था। मशहूर शायर लक्ष्मीशंकर वाजपेयी कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे थे। उनके अलावा अब मुझे ही पढ़ना था कि श्रोताओं के बीच कुछ हलचल महसूस होने लगी। मुझे लगा, मैं श्रोताओं को बांध नहीं पा रही, उनका ध्यान भटक रहा है। मगर जब सुपरिंटेंडेंट साहब ने माइक पर यह घोषणा की कि आज खाना देर तक चलेगा, इसलिए वे परेशान न हों तब उनकी हलचल का मतलब समझ आ गया। इस घोषणा के बाद वे तो निश्चिंत हो गए पर हमारे भीतर उनके अनुशासन का दबाव तेज हो गया। वाजपेयी जी ने मुझे कविता पाठ के लिए आमंत्रित किया। मैंने अपनी कुछ छोटी-छोटी कविताएं सुनाईं। मुझे संतोष हुआ कि मेरी कविताएं उन तक पहुंच पाईं जिसकी गवाही उनकी आंखें दे रही थीं। मैंने जल्दी से अपनी पारी पूरी कर वाजपेयी जी को अध्यक्षीय वक्तव्य के साथ-साथ रचनापाठ के लिए पुकार लिया। वाजपेयी जी के प्रेरक उद्बोधन और सस्वर कवितापाठ का श्रोता भरपूर आनंद ले रहे थे मगर समय का दबाव मन पर हावी हो चुका था और हमने जल्दी ही इस कवि सम्मेलन का समापन कर दिया। इसके बाद सभी कवियों ने कैदियों के साथ तस्वीरें खिंचवाईं। कवयित्रियां मंच पर ही रहीं जबकि कविगण नीचे उतर कर उन कैदियों के साथ खड़े हो गए।
खूबसूरत लॉन में हमारे खाने का बंदोबस्त किया गया था।
“कहते हैं, जेल का खाना खाने से जेल योग कट जाता है।” मास्टर लोक ने बताया तो कुछ कवियों ने इसे मजाक के तौर पर लिया मगर वे गंभीर थे। मास्टर लोक ‘इनर सर्किल फाउन्डेशन’ के संस्थापक हैं। वे जेल के हालात और इन मुजरिमों के साथ काफी रच-बस गए हैं और इन कैदियों को अवसाद से बचाए रखने के लिए लगातार कार्यशालाएं आयोजित करते रहते हैं। इन्होंने अब तक इतनी कार्यशालाएं आयोजित की हैं कि इनका नाम लिम्का बुक ऑफ रिकार्ड्स में दर्ज हो चुका है।
बहरहाल, खाने में मिक्स दाल, कटहल की सब्जी के साथ चावल व रोटी, दोनों विकल्प थे। खाना सादा मगर स्वादिष्ट था। पेड़ों के ऊपर बांस की छप्पर-सी डाली हुई थी जिसकी छांह में बैठकर खाने से इसका स्वाद और भी बढ़ गया था।
चौहान साहब ने बगीचे के किनारों पर बने ध्यान कक्ष की ओर इशारा करते हुए बताया कि यहां अलग-अलग धर्मों के हिसाब से प्रार्थना स्थल बनाए हुए हैं जहां कैदी अपनी तरह से पूजा-आराधना कर सकता है। यह सब देखकर इसे जेल कहना ठीक नहीं लगता, इसे साधना गृह या कुछ और कहना चाहिये। किरण बेदी ने इसे आश्रम का नाम दिया था जो सही में बहुत उपयुक्त है। इसमें शक नहीं कि किरण बेदी ने इस दिशा में विलक्षण काम किया है और बाद के अधिकारियों ने भी इस परंपरा का निर्वाह करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। ऐसी कई संस्थाएं हैं जो जेल के अधिकारियों के साथ मिलकर कैदियों को बेहतर जीवन जीने की ओर प्रेरित करती रहती हैं। स्वयं निर्मल वैद ने अपनी संस्था-‘परिधि’ के तत्वावधान में स्वास्थ्य के प्रति सजग करने के उद्देश्य से कई जेलों में नुक्कड़ नाटक किए हैं और इस कारण निर्मल वैद का नाम भी लिम्का बुक ऑफ रिकार्ड्स में स्थान पा चुका है। ऐसी निष्ठावान संस्था के साथ इस तरह की गतिविधियों में शामिल होना मुझे भी भीतर तक संतुष्ट कर रहा है। निर्मल वैद की अगली तैयारी जेलों में पेंटिंग प्रदर्शनी लगाने की है जिसके बारे में वे लगातार जेल अधीक्षक से बात कर रहे हैं।
धूप ढल चुकी है और ठंडी हवाएं मौसम को खुशनुमा बना रही हैं। आजकल घड़ी पहनना तो लगभग सबने बंद ही कर दिया है, मोबाइल में ही समय देख लेते हैं मगर हमारे मोबाइल जेल के भीतर आने से पहले ही जमा करा लिए गए थे इसलिए अंदाजे से कह सकती हूं कि लगभग सात बज रहे होंगे।
लॉन से बाहर निकल कर अब हम उन बैरक्स की तरफ जा रहे हैं जिन्हें आते समय दूर से देखा था। हम नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नाम वाले वार्ड में दाखिल हुए। सामने ही नेताजी की एक मूर्ति लगी थी। भीतर जाने लगी तो बाहर बने नोटिस बोर्ड पर निगाहें ठहर गईं। वहां किसी निबंध प्रतियोगिता के बारे में नोटिस लगा था। देख कर अच्छा लगा कि यहां भी प्रतियोगिताएं होती हैं। ये भी सामान्य लोगों का सा जीवन जीते हैं। नोटिस बोर्ड पर हाथ की लिखी कुछ कविताएं भी टंगी थीं जिसके नीचे लिखने वाले के नाम के साथ कैदी संख्या भी लिखी थी। यानी ये कैदियों की लिखी कविताएं थीं। एक कविता ने खास तौर पर ध्यान खींच लिया। शीर्षक था – “मां के हाथ की सब्जी”
“मां, तुम जो रोज इतनी अच्छी सब्जी बना कर खिलाती हो
दो दिन बाद जेल का खाना कैसे खा पाऊंगा
मैंने मां से पूछा तो मां ने कहा,
दो दिन बाद तो मैं भी ऐसी सब्जी कहां बना पाऊंगी…”
कविता पढ़कर मेरा मन भर आया। मैं अभी और भी कविताएं पढ़ती मगर मेरा दस्ता आगे बढ़ गया था। हड़बड़ी में कवि का नाम भी पढ़ने से चूक गई। डर गई कि कहीं इनसे बिछुड़ गई तो मेरी कलाई में तो कोई मुहर भी नहीं है कि मैं इन्हें अपनी कोई पहचान बता पाऊं। मैं झटक कर अपने दल से आ मिली। बीच में छोटा-सा खुला दालान था जिसकी दूसरी तरफ एक बड़ा-सा हॉल था। इन बैरक्स को देख कर एनसीसी के कैम्पों वाले दिन याद हो आए। एक हॉल में आठ-दस लड़कियां होती थीं। थोड़ी-थोड़ी दूरी पर एक दूसरे के बिस्तर लगे होते। हम रात भर चुहलबाजी और शरारतों में जगे रह जाते और सुबह पानी की बाल्टी लिए लाइन में लगे मिलते। बचपन की सलोनी यादें जहन में समेटे मैंने इस हॉल के भीतर झांका। यह काफी बड़ा हॉल था। इसमें लगभग 60-70 कैदियों के रहने की व्यवस्था थी। बिस्तर एक-दूसरे से बिलकुल सटे हुए थे। हर बिस्तर के पायताने एक बाल्टी और मग रखा था। हॉल की बाईं तरफ कुछ खुले पड़े लॉकर्स थे जिनमें कुछ एअरबैग रखे थे। बाद में पता चला कि यहां रहने वाले अभी पूरे कैदी नहीं थे। इनका जुर्म अभी सिद्ध नहीं हुआ था और इन्हें ट्रायल पर रखा गया था। मुझे सहानुभूति हुई। पता नहीं, कौन मुजरिम है, कौन नहीं पर फिलहाल तो सभी यहां बंद हैं।
निर्मल वैद पेंटिंग प्रदर्शनी लगाने के लिहाज से उस हॉल में की जाने वाली तब्दीलियों की ओर इशारा कर रहे थे और चौहान साहब बहुत गंभीरता से उन सुझावों पर गौर कर रहे थे। इसके बाद वे हमें एक और हॉल में ले गए। यह शायद यहां की आर्ट गैलरी थी। संभवतः ये चित्र निर्मल वैद की संस्था से आए होंगे या फिर… नहीं, कैदियों ने तो नहीं बनाए होंगे।
“इनकी लगेगी प्रदर्शनी।”
निर्मल वैद ने कहा तो मैं पूछे बिना न रह सकी, “किसने बनाए हैं ये चित्र?”
“इन्हीं कैदियों ने।” चौहान साहब ने पूरी धमस के साथ बताया तो चित्र और भी कीमती हो उठे। दीवार पर बने सानिया मिर्जा के पेंसिल स्केच ने सभी का ध्यान खींचा। कुछ तैल चित्र भी बेहद कलात्मक बन पड़े थे।
“कितने सुंदर हैं, बिलकुल प्रोफेशनल!” मैं कहे बिना न रह सकी, “बाहर की ऊंची दीवारों पर जो पेंटिंग्स बनी हैं…”
“वे भी इन्हीं कैदियों ने बनाई हैं।” मुझे सवाल पूरा करना ही नहीं पड़ा। चौहान साहब मेरे आश्चर्य का लुत्फ उठा रहे थे। मैंने पाया, उनके भीतर इन मुजरिमों के प्रति एक मानवीय संवेदना थी।
“इसे देख रही हैं?” चौहान साहब ने दीवार पर बने एक स्केच की तरफ इशारा किया।
16-17 साल की खूबसूरत लड़की का स्केच था, संथाली वेश-भूषा में। मैं सोचने लगी, जरूर कोई हिरोइन होगी। मैं तो फिल्में कम देखती हूं, इसलिए पहचान नहीं पा रही।
चौहान साहब ने बताया कि एक कैदी को लॉक-अप में रखा गया था। उसने रात भर में सारी दीवारें अपनी पत्नी के स्केच से भर दीं। यह उसकी पत्नी का स्केच है।
“कॉपी पर, दीवार पर, हर समय वह इसी की तस्वीर बनाता रहता था।” चौहान साहब ने बताया कि उसकी नई-नई शादी हुई थी और वह अपनी पत्नी से बेइंतहा प्यार करता था।
“उसे किस अपराध में यहां लाया गया था?” मेरा मन उसके प्रति एक तरह की आत्मीयता से भर उठा था।
“पत्नी की हत्या के जुर्म में।”
मैं स्तब्द्ध रह गई। लगा, जैसे किसी ने ऊंचे पहाड़ से नीचे धक्का दे दिया हो।
“क्यों? क्यों किया उसने ऐसा?” मैं चीखना चाहती थी मगर जबान तालु से जा चिपकी थी।
“वहम बहुत बुरी चीज होती है, मैडम।” कहते हुए चौहान साहब आगे बढ़ गए थे।
पैरों में जैसे भारी वजन बांधे मैं चौहान साहब के पीछे चल दी।
“आप तो कहानियां लिखती हैं, इनसे मिलिये।” मुझे पिछली बार की वह घटना आंखों में ताजा हो आई जब तत्कालीन जेल अधीक्षक शमशेर सिंह जी ने भीड़ में किसी की तरफ इशारा किया था।
साफ-धुला कुरता पाजामा पहने अधेड़ उम्र का वह व्यक्ति काफी जहीन मालूम पड़ रहा था।
“हम सभी जानते हैं कि ये बेकसूर हैं, इन्हें गलत फंसाया गया है। पर क्या करें?” उन्होंने बताया था कि अपने देश के कुछ गुप्त दस्तावेज दूसरे देश भेजने के जुर्म में वह व्यक्ति उम्र कैद की सजा काट रहा था। उनका कहना था कि पेपर उच्चाधिकारियों ने इधर-उधर किए, मगर फंस गया यह। पेपर इसीकी कस्टडी में थे, सो जिम्मेदारी इसी पर ठहराई गई।
“जब आया था तब नौजवान था। स्मार्ट एंड हैंडसम,” उन्होंने कहा था, “अब तो अगले दो महीने में इसकी रिहाई होने वाली है।”
“जब आप इसकी ईमानदारी को पहचान सकते हैं तो कोर्ट क्यों नहीं…?” मैंने धीरे से पूछा था।
“कोर्ट एविडेंस पर चलता है और एविडेंस इसे गलत साबित करते हैं।” इतना कह कर शमशेर सिंह भी चौहान साहब की तरह ही झटक कर आगे बढ़ गए थे, जैसे उन्होंने अपने ही भीतर उठ रहे कई सवालों से मुंह फेर लिया हो।
कई बार सही-गलत के बीच का फासला कितना कम होता है। मन में अजीब-सी उधेड़बुन चल रही थी। कुरता-पाजामा पहने वह शख्स भी आज याद आ रहा था, जिसके बारे में शमशेर सिंह जी ने बताया था। गहरे निःश्वास के साथ मैं सोच रही थी कि वह अब तक रिहा होकर अपने घर पहुंच चुका होगा, मगर क्या वह वही शख्स होगा जिसे यहां लाया गया था? घर के आईने में जब उसने अपना चेहरा देखा होगा तो क्या वह खुद को पहचान पाया होगा? कितनी शिद्दत से तलाशा होगा उसने उसे जो बरसों पहले वहां रहा करता था। उसने उसे बिस्तर के नीचे, परदों के पीछे, खिड़की से बाहर, बगीचे में, सड़क पर, हर तरफ तलाशा होगा, जिसे उसने सुना था कि रिहा कर दिया गया है। या फिर, यह व्यक्ति जो दिन रात अपनी पत्नी के चित्र बनाता रहता है, जो अपनी पत्नी से बेइन्तहा प्यार करने के बावजूद उसका कत्ल कर बैठा था। जब उम्र कैद की लंबी सजा काट कर बाहर निकलेगा तब वह भी वह कहां रह जाएगा? उसकी शिद्दत उसे कितना तोड़ चुकी होगी, भीतर का फौलाद पिघल कर पानी हो चुका होगा। क्या पता, वह इतना शिथिल हो गया होगा कि प्रतिक्रियाएं भी विलुप्त हो चुकी होंगी। गोया उसके भीतर सांस तो बची होगी पर जिंदगी नहीं।
बाहर निकलने से पहले चौहान साहब ने सभी कवि को कैदियों द्वारा बनाई गई बिस्कुट-नमकीन के पैकेटों की सौगात दी। अब तक इन कैदियों से गहरी आत्मीयता बन चुकी थी और ये तोहफा बहुत मूल्यवान हो उठा था। बाहर निकलते हुए हमारे फोन, पर्स, गाड़ी की चाबी इत्यादि हमें वापस सौंप दी गईं। एक खामोशी हमारे बीच तैर रही थी। भीतर का शोरगुल जेल के भीतर ही छोड़ हम रिहा हो रहे थे मगर ख्यालों की गिरफ्त में बेतरह कैद थे।