January 5, 2026

कविता: सिलपोखरी, गुवाहाटी (असम) | Poem: Silpokhori, Guwahati (Assam)

By Alka Sinha

कविता – सिलपोखरी, गुवाहाटी (असम) | Poem – Silpokhori, Guwahati (Assam)

कविता गुवाहाटी (असम) में एक स्थान है – सिलपोखरी। शिला की इस पोखरी के भीतर जल कहाँ से आता है, कहाँ को जाता है, नहीं मालूम, मगर सिलपोखरी सदानीरा रहती है। उसी सिलपोखरी पर तीन कवितायें।

सिलपोखरी – 1

गेस्ट हाउस की खिड़की से
दिखाई पड़ती है –
सिलपोखरी

उसमें पड़ती है
सूरज की पहली किरण
सुनहले जल में थिरकने लगती हैं
छायाएं नारियल और सुपारी के वृक्षों की
इन पेड़ों और जल की छाया
थरथराती है मेरी दीवार पर

आखिर इन पेड़ों का
इस जल से
इस जल का इस दीवार से
दीवार का मेरी नज़र से
क्या नाता है?

मैं झांकती हूं जल के भीतर
और मिलान करती हूं
एक-एक पेड़
एक-एक बादल का

आखिर खोज ही लेती हूं
उस गैर-मौजूद बादल की उपस्थिति
जो आस्मां पर तो कहीं नहीं
पर धड़कता है सिलपोखरी के भीतर
कि शिला के अंतस से
निकल आता है जल
जिसकी खातिर भूलकर
अपना रंग और आकार
पारदर्शी हो जाती है सिलपोखरी
जिसमें देखकर अपनी छाया
संवरने लगती है आसपास की दुनिया।

सिलपोखरी – 2

पानी का पत्थर से प्रेम हुआ
पानी का धर्म था पारदर्शी
पत्थर था कट्टर
पानी था लोचदार, पत्थर नोकदार
जल का स्वरूप तरल, स्वभाव चंचल
पर्वत ठोस, अचल
अलग धर्म, अलग जाति
मगर प्रेम में कैसा धर्म, कैसी जाति
तो पानी का पत्थर से प्रेम हुआ।

मुहब्बत की कहानी
जब गली-गली आम हो गयी
खूब बदनाम हो गयी
तो शोर मचाया धर्म के ठेकेदारों ने
जाति के फरमां-बसदारों ने
बेदखल हो गए दोनों जाति-धर्म से

बदल कर अपना धर्म
पत्थर ने पैदा की अपने भीतर
गहराई
नदी ने छोड़ी चंचलता
और पत्थर में समाने लगी
सिलपोखरी कहलाने लगी।

सिलपोखरी – 3

छोटी-सी सिलपोखरी
मगर कितना बड़ा है इसका कलेजा
जिसमें समाई हैं अनंत आकृतियां
सभी को मिली है पनाह इसके जल में
आसपास झुके पेड़
सामने वाली इमारत
ऊँचा पहाड़
आसमान
बादल
यहाँ तक कि उड़ते हुए पंछी भी

इन सबका हाथ थामे
गा रही है सिलपोखरी —
रिंगा रिंगा रोज़ेज़।

दिन भर चहकती रही
चांदी-सी चमकती रही
पर शाम होते-होते
उदास हो गयी सिलपोखरी
उदास हो गयी
आसपास की वनस्पति
और रात होते तक तो
पथरा गयी सिलपोखरी
स्थिर हो गया इसका जल
बिना किसी हलचल
पथरा गए सब —
आसपास झुके पेड़
सामने वाली इमारत
ऊँचा पहाड़
आसमान
बादल
सब!

उजाला हुआ
तो डाब लदे वृक्षों ने आवाज दी
गुलमोहर की नन्हीं पत्तियों ने मनाया
बूढ़े बरगद ने निहोरा किया
अरी उठ न सिलपोखरी!

सिलपोखरी! सिलपोखरी!!
चिड़ियों ने आवाज़ दी
दिशाएं गूंजने लगीं पंछियों के स्वर में
पहाड़ भी झुक आया सिलपोखरी के जल में
अब तो मान जा री सिलपोखरी !

धीरे-से उठा लाल-लाल सूरज
सिंदूर झोलने लगा
देखते-ही-देखते
लाल हो गया सिलपोखरी का जल

सुहाग का जोड़ा पहने
सिलपोखरी लजाने लगी
झूम-झूम प्रकृति
कोहबर गाने लगी!