कविता -झारखंड की लड़की
कविता –
झारखंड की लड़की
जंगल-झाड़ कूदती, फलांगती
लकड़ी का गट्ठर पीठ पर बांधती
स्कूल अहाते के बाहर
थक कर बैठी है झारखंड की एक लड़की
दो एकम दो, दो दूनी चार का गीत गा रही है
पेड़ की टहनी से बांध कर झूला, पींग बढ़ा रही है
धूसरित धरती पर उंगरी उकेर रही है
अ से अनार, आ से आम टेर रही है
स्कूल अहाते के बाहर
थक कर बैठी झारखंड की एक लड़की।
उसे खबर नहीं
कि एजेंट ने भर दी है उसके पिता की जेब
अब वह उसे नौकरी कराने दिल्ली ले जाएगा
जहां औरों की खातिर झाड़ते-बुहारते,
घर संवारते
बिखर जाएंगे उसके छोटे-छोटे सपने।
जरा गौर से देखो और पहचानो इसे
यह भी तो मलाला ही है।
वही मलाला
जिस पर हुए तालिबानी हमले के विरोध में
समूची दुनिया एकजुट हो गई थी
वही मलाला
जिसकी डायरी इंटरनेट आदि के जरिये
दुनिया भर में पढ़ी गई थी।
वही मलाला
जिसके भाषण पर यूएनओ की सभा में
देर तक तालियां गूंजती रही थीं।
इस मलाला पर भी हो रहे हैं वैसे ही हमले
जो उसके सोचने-समझने की ताकत
और कुछ कर दिखाने की इच्छा को
नेस्तनाबूद कर रहे हैं।
धूसरित धरती पर उंगरी उकेरती
इस मलाला की डायरी को भी
जरा ध्यान से पढ़ो
जिसमें लिखी इबारत
आम-अनार के छिलके-बोकले की तरह
कूड़े के साथ बुहार दी जाएगी
काश! कोई सहेज ले इसकी डायरी के ये पन्ने
इसके अरमान, इसके सपने
कि यह मलाला भी पढ़ सके
यूएनओ में अपनी बात कह सके
इसकी भी बोली से गूंज उठे देश और दुनिया
क्या फर्क पड़ता है इसका नाम
मलाला है कि मुनिया !